मुझे याद है की मैं अपने कालेज के
दिनों में एक नौजवान से मिला था, सन 2007 में जब मैं कानून का तालिबे इल्म
था और वो मुझसे 2 साल जूनियर | यूँ तो हम आस-पास ही रहते थे, और बराबर दुआ
सलाम हो जाया करती थी, पर एक दिन शाम के वक्त एक टी स्टाल पर चाय पीते हम
दोनों के दरमियान कुछ बातें हुयी, मुझे उसमे कुछ संभावना नज़र आई | जनाब को
पोलिटिक्स का बड़ा शौक था, न्यूज़ अपडेट, पोलिटिकल Analysis बेजोड़ था |
वकालत होने के बाद मैं कुछ वक्त के
लिए दिल्ली चला गया , फिर रांची आ कर हाईकोर्ट से सफ़र शुरू किया… मुलाकात
तो होती रही पर कुछ ख़ास नजदीकी नहीं रही |
अतिक्रमण हटाओ अभियान जिसे मैं “गरीबो को हटाओ” अभियान कहता हूँ, के दौरान हम दोनों को एक केस पर साथ काम करने का मौका मिला…. और जिस तरह से उसने पहाड़ी टोला बचाने की जद्दो जहद की यही देख कर मैं ये ब्लॉग लिखने को मजबूर हो गया | अतिक्रमण हटाओ अभियान की मुखालफत मैं मई 2010 से ही कर रहा हूँ और नेशनल हाकर फेडरेशन का वकील भी हूँ, झारखण्ड नागरिक बचाओ आन्दोलन के कोर कमिटी का मेम्बर भी हूँ साथ साथ सुप्रीम कोर्ट में भी एक केस पर काम भी किया है जिसकी मुद्दई नामी गिरामी सोशल एक्टिविस्ट मेधा पाटेकर और बस्ती बचाओ संघर्ष समिती हैं | अमूमन में मैंने देखा है लोग जिनका मकान/दूकान अतिक्रमण के दायरे से बाहर है उन्हें कोई मतलब नहीं होता है, सिवा अफ़सोस जताने के लोग और कुछ नहीं करते, और ज़्यादातर लोग तो “ग़रीबों को हटाओ” अभियान की वकालत करते हैं | पर ये शख्स अपने घर वालो के मना करने के बावजूद झुग्गियो में जा कर सैकड़ो मीटिंग कर चूका है, लोगो को गोलबंद करना, रांची में अतिक्रमण हटाओ अभियान के खिलाफ जितने भी आन्दोलन, बैठकें हुयी मैंने जावेद को वहां पाया, इसमें उसका कोई मुनाफा नहीं, कोई फायेदा नहीं, सिर्फ एक सोच की गरीबों का घर कैसे बचाया जाए? 12 बजे रात रात तक मेरे ऑफिस में बैठ के मुझसे बहस की… क्या किया जाए लोगो को बचाने के लिए… कोशिश भी की हम लोगो ने…
आज भी मिला उनसे, चेहरा मायूस था पर आँखे चमक रही थी… कहा …हमलोगों ने कम से कम इमानदारी से कोशिश की…. रिजल्ट देना अल्लाह का काम है | मुझे भी हौसला हुआ | अभी थोड़ी देर पहले ही उजड़े घर और बच्चो, बूढों, औरतो को सड़क के किनारे देख के आया हूँ … मुझे अपने फ्लैट के छत से नफरत सी होने लगी है |
अतिक्रमण हटाओ अभियान जिसे मैं “गरीबो को हटाओ” अभियान कहता हूँ, के दौरान हम दोनों को एक केस पर साथ काम करने का मौका मिला…. और जिस तरह से उसने पहाड़ी टोला बचाने की जद्दो जहद की यही देख कर मैं ये ब्लॉग लिखने को मजबूर हो गया | अतिक्रमण हटाओ अभियान की मुखालफत मैं मई 2010 से ही कर रहा हूँ और नेशनल हाकर फेडरेशन का वकील भी हूँ, झारखण्ड नागरिक बचाओ आन्दोलन के कोर कमिटी का मेम्बर भी हूँ साथ साथ सुप्रीम कोर्ट में भी एक केस पर काम भी किया है जिसकी मुद्दई नामी गिरामी सोशल एक्टिविस्ट मेधा पाटेकर और बस्ती बचाओ संघर्ष समिती हैं | अमूमन में मैंने देखा है लोग जिनका मकान/दूकान अतिक्रमण के दायरे से बाहर है उन्हें कोई मतलब नहीं होता है, सिवा अफ़सोस जताने के लोग और कुछ नहीं करते, और ज़्यादातर लोग तो “ग़रीबों को हटाओ” अभियान की वकालत करते हैं | पर ये शख्स अपने घर वालो के मना करने के बावजूद झुग्गियो में जा कर सैकड़ो मीटिंग कर चूका है, लोगो को गोलबंद करना, रांची में अतिक्रमण हटाओ अभियान के खिलाफ जितने भी आन्दोलन, बैठकें हुयी मैंने जावेद को वहां पाया, इसमें उसका कोई मुनाफा नहीं, कोई फायेदा नहीं, सिर्फ एक सोच की गरीबों का घर कैसे बचाया जाए? 12 बजे रात रात तक मेरे ऑफिस में बैठ के मुझसे बहस की… क्या किया जाए लोगो को बचाने के लिए… कोशिश भी की हम लोगो ने…
आज भी मिला उनसे, चेहरा मायूस था पर आँखे चमक रही थी… कहा …हमलोगों ने कम से कम इमानदारी से कोशिश की…. रिजल्ट देना अल्लाह का काम है | मुझे भी हौसला हुआ | अभी थोड़ी देर पहले ही उजड़े घर और बच्चो, बूढों, औरतो को सड़क के किनारे देख के आया हूँ … मुझे अपने फ्लैट के छत से नफरत सी होने लगी है |
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